कौन जाने चित्र हैं या बिंब हैं !
(एक)
नीम शिखर पर
दोएल गाए
प्रात: की आँखों में झाँके
गाते-गाते ही उड़ जाए !
(दो)
खिले कपास के फूल
लद गया उषा का भाल
प्रात: के आँगन में
छिटका सौंदर्य संजाल !
(तीन)
हुई द्वार पर
बाल-सूर्य की मीठी ठक्-ठक्
जगी नींद से
मजदूरों की बस्ती भौंचक !
(चार)
अलस भोर में भरी नींद
मच्छर ने काटा, रोया
किलसाया बालक, मारा अपने
लाल कपोल पर चाँटा !
(पाँच)
उछला गुर्राया कुत्ता
चढ़ा पेड़ पर बंदर
खी-खी भौं-भौं खी-खी भौं-भौं
सुबह-सुबह का मंजर !
(छ:)
भीषण गर्मी, भागी
बिजली शहर बेचारा
माथा पीटे
क्या है चारा !
(सात)
रश्मि यौवना युवक मेघ वह
गगन घाट सैना-मैनी
बूढ़ी पत्ती नैन नचाए
कोयल हिला रही टहनी !
(आठ)
चुटकी भर सिंदूर हटाईं
प्रिय ने अलकें
लजवंती छुई-मुई मूँद लीं
हौले से पलकें !
(नौ)
एक कबूतर
सुबह-सुबह खिड़की पर
दाने चुगा रही युवती के
मुस्कान नाचती अधरों पर !
(दस)
हवा का पोस्टमैन
पहुंचाए द्वारे-द्वारे
परिमल की चिठिया
साँझ और सकारे !
(ग्यारह)
रेल नदी पुल
खिड़की उछले सिक्के
चमकीं आँखें सांस खींच गहरे---
पाने में कूदे बच्चे !
(बारह)
चंचल झिलमिल लहरें
मछली की आँखों में
सरिता की मर्यादा
चिड़िया की पांखों में !
(तेरह)
अदृश्य धागों से दिक्-काल
बुन रहे नूतन अनुभव जाल
सभ्यता खोज रही दिन-रात
दहकते प्रश्नों के सुर-ताल !
(चौदह)
पथिकों की आँखों में
एक सपना आ जाए
नक्षत्र-लोक से संध्या
कुछ फूल चुरा लाए !
(पंद्रह)
सक्रियता भरे हों
दिवस के सभी क्षण
जीते रण जिजीविषा
सभी की हर पल !
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