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राजा रंक किसान राम हैं.....

     मानव-द्रोही ध्वस्त हुए जिनके धनु की टंकारों से , लोक पूजता उन्हीं राम को गीतों   से    जयकारों   से ।   राजा रंक किसान राम हैं लोका-मार्ग    के    वाही ,   नगर गाँव जंगल के वासी राम   चरित   गुण   ग्राही ।   कंबन   पंप   कंदली   रेड्डी तुलसी   कृत्तिवास   के   राम , रामकथा   के   गाने   वाले वाल्मीकि   गोविंद   बलराम ।   राम नहीं जेबों के सिक्के या   बंदी   देवालय   के , राम हमारी लोक-संपदा मुक्त प्राण लोकालय के ।   मुक्त करो उस राष्ट्र-पुरुष को स्वार्थों   की   कारा   से , अलगाओ मत संस्कृति-पुरुष को जन-जीवन   की   धारा   से ।          ------             

आदिवासियों को लौटा दो

    रहस्यमयी प्रकृति के साधक जल के थल के वन-संपद के , स्वामी सखा सहोदर साथी सूत्रधार   जीवन-संसद   के ।   अमृतमयी संस्कृति गो-मुख सहज   आस्था के   निर्माता , भाव चिंतना प्रज्ञा प्रतिभा प्रकृत मूल्य सत्य उद्गाता ।   पेना   ढाक   बांसुरी   ढोलक उत्फुल्ल राग मधु चुंबित गायन , मादक प्राणों की स्वर लहरी नर्तित नखत रहस्य वातायन ।   लता गुल्म पर्वत शिखरों से प्रश्न भरा   संवाद   निरंतर , जिज्ञासा भय नव आकर्षण व्याकुल हृदय खोजता उत्तर ।   यह विकास की शर्त अनोखी विस्थापन में   खोजो   मंगल , आदि काल के आदि मनुज से छीनो पानी   छीनो जंगल !   कभी तो लावा फूट पड़ेगा राख़ करेगा शोषक दल को ,   मत छेड़ो झरनों के जल को मत काटो उनके जंगल को ।   लाठी गोली बल्लम भाला कुछ न करेंगे ये हथियार , आदिवासियों को लौटा दो उनका मुक्त मधुर संसार ।       ------         

जंगल की गरदन पर आरे........

    (एक) भारी बूटों ने हरे-भरे जंगल   को   नापा , भूखी-प्यासी अंडे सेती चिड़िया का दिल काँपा ।   (दो) पहला पेड़ कटा तो रोया फूट-फूट कर एक किसान ,   आसमान में उसने देखा हँसता-गाता एक मसान !   (तीन) सूनी घाटी नंगे पर्वत बादल भूल गए आना , उजड़े जंगल कहाँ खो गया मधु वसंत का मुसकाना ।   (चार) बादल के गुस्से से डर कर छिप जाती थीं कभी लताएँ , पेड़ों के सीने में , पेड़ कट गए , कहाँ ठौर पाएँगी क्या बतलाएँ !   (पाँच) मिट्टी अंकुर वर्षा बादल मधुर काकली धारा चंचल , व्याकुल हो आवाज़ लगाते जंगल जंगल जंगल जंगल !   (छ:) मन में क्षोभ पलाश के फूलों की   आँखों   में   क्रोधानल , पेड़   कटैया   हत्यारों   के पीछे जुलूस में दावानल ।   (सात) एक पेड़ था वही काट कर भेज   दिया   कलकत्ता , लड़के सोच रहे खेलें अब कहाँ   ससुर   कनपत्ता !   (आठ) जंगल की गरदन पर आरे यह   पूंजी   का   खेल , जितने शव सब लाद...

कौन जाने चित्र हैं या बिंब हैं !

    (एक) नीम शिखर पर दोएल गाए प्रात: की आँखों में झाँके गाते-गाते ही उड़ जाए !   (दो) खिले कपास के फूल लद गया उषा का भाल प्रात: के आँगन में छिटका सौंदर्य संजाल !   (तीन) हुई द्वार पर बाल-सूर्य की मीठी ठक्-ठक् जगी नींद से मजदूरों की बस्ती भौंचक !   (चार) अलस भोर में भरी नींद मच्छर ने काटा , रोया किलसाया बालक , मारा अपने लाल कपोल पर चाँटा !   (पाँच) उछला गुर्राया कुत्ता चढ़ा पेड़ पर बंदर खी-खी भौं-भौं खी-खी भौं-भौं सुबह-सुबह का मंजर !   (छ:) भीषण गर्मी , भागी बिजली शहर बेचारा माथा पीटे क्या है चारा !   (सात) रश्मि यौवना युवक मेघ वह   गगन घाट सैना-मैनी बूढ़ी पत्ती नैन नचाए कोयल हिला रही टहनी !     (आठ) चुटकी भर सिंदूर हटाईं प्रिय ने अलकें लजवंती छुई-मुई मूँद लीं हौले से पलकें !        (नौ) एक कबूतर सुबह-सुबह खिड़की पर दाने चुगा रही युवती के मुस्कान नाचती अधरों पर ! (दस) हवा का पोस्टमैन पहुंचाए द्वारे-द्वारे ...