आदिवासियों को लौटा दो

 

 

रहस्यमयी प्रकृति के साधक

जल के थल के वन-संपद के,

स्वामी सखा सहोदर साथी

सूत्रधार  जीवन-संसद  के ।

 

अमृतमयी संस्कृति गो-मुख

सहज  आस्था के  निर्माता,

भाव चिंतना प्रज्ञा प्रतिभा

प्रकृत मूल्य सत्य उद्गाता ।

 

पेना  ढाक  बांसुरी  ढोलक

उत्फुल्ल राग मधु चुंबित गायन,

मादक प्राणों की स्वर लहरी

नर्तित नखत रहस्य वातायन ।

 

लता गुल्म पर्वत शिखरों से

प्रश्न भरा  संवाद  निरंतर,

जिज्ञासा भय नव आकर्षण

व्याकुल हृदय खोजता उत्तर ।

 

यह विकास की शर्त अनोखी

विस्थापन में  खोजो  मंगल,

आदि काल के आदि मनुज से

छीनो पानी  छीनो जंगल !

 

कभी तो लावा फूट पड़ेगा

राख़ करेगा शोषक दल को, 

मत छेड़ो झरनों के जल को

मत काटो उनके जंगल को ।

 

लाठी गोली बल्लम भाला

कुछ न करेंगे ये हथियार,

आदिवासियों को लौटा दो

उनका मुक्त मधुर संसार ।

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