जंगल की गरदन पर आरे........
(एक)
भारी बूटों ने हरे-भरे
जंगल को नापा,
भूखी-प्यासी अंडे सेती
चिड़िया का दिल काँपा ।
(दो)
पहला पेड़ कटा तो रोया
फूट-फूट कर एक किसान,
आसमान में उसने देखा
हँसता-गाता एक मसान !
(तीन)
सूनी घाटी नंगे पर्वत
बादल भूल गए आना,
उजड़े जंगल कहाँ खो गया
मधु वसंत का मुसकाना ।
(चार)
बादल के गुस्से से डर कर
छिप जाती थीं कभी लताएँ,
पेड़ों के सीने में, पेड़ कट गए,
कहाँ ठौर पाएँगी क्या बतलाएँ !
(पाँच)
मिट्टी अंकुर वर्षा बादल
मधुर काकली धारा चंचल,
व्याकुल हो आवाज़ लगाते
जंगल जंगल जंगल जंगल !
(छ:)
मन में क्षोभ पलाश के फूलों
की आँखों में
क्रोधानल,
पेड़ कटैया हत्यारों
के
पीछे जुलूस में दावानल ।
(सात)
एक पेड़ था वही काट कर
भेज दिया कलकत्ता,
लड़के सोच रहे खेलें अब
कहाँ ससुर कनपत्ता !
(आठ)
जंगल की गरदन पर आरे
यह पूंजी का खेल,
जितने शव सब लाद ले गई
राजा जी की रेल
।
(नौ)
कटे पेड़ हरियाली सूखी
पत्ते मिले न घास,
दूध थनों का भूख पी गई
गैया हुई उदास ।
(दस)
बछड़ा हूल थनों में मारे
कटे पेड़ को
ताके,
दुष्ट कुल्हाड़ी के सीने में
सींग मार दूँ जा के !
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