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अप्रैल, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मेरा कस्बा मेरी धरती

                                      मेरा कस्बा मेरी धरती जहाँ उगा मैं धीरे-धीरे इसकी मिट्टी की भुरभुरी रेशमी सपनीली उत्पादकता की कुनकुनी छुवन की गहराई से ।   मेरा कस्बा मेरी धरती जहाँ भोर के झीने गुदगुदे नरम बिछोने पर मेरे बचपन को हौले से खींच अंक में चिपटा छाती से सुंदरता से भी सुंदर उषा सुंदरी ने स्तनपान कराया टाँक दिए वात्सल्य भरे अनगिन चुंबन माथे पर पलकों पर ।   मेरा कस्बा मेरी धरती जिसके विस्तृत श्यामल आंगन में मेरी उत्साह भरी भोली चंचल किलकारी को प्रात: ने अपनी बलशाली बाँहों में लेकर कितनी बार उछाला आसमान में हँसता रहा बजा कर ताली ऊपर से नीचे आते ही लपक संभाल कंधे पर बैठा कर लगा नाचने बहलाने को ।   मेरा कस्बा मेरी धरती जिसकी सड़कों गलियों चौराहों से जीवन के नव-रस संबंध निभाते ललक भरे परिचय के खट्टे-मीठे अरस-रसीले गढ़-अनगढ़ संवेदन पोषित अक्सर खुलते ...

गरमी बाघिन

          गरमी धूप तपिश की सुबहें            सूरज चार बाँस            चढ़ते ही            घूमने लगते            लू के लठैत विकराल            किसी कोने में            छिप न सके           थोड़ी-सी भी            शीतल मंद पवन            पथिकों से            हँसी-ठिठोली करके            उनका श्रम हरने को;            सभी भयंकर ध्वनियों को            निर्ममता से            कुचल-कूट कर            तत्ते पानी में            घ...

जितने भी दीप जलें

     जितने भी दीप जलें फलें सभी में जन-मन के सपने उजले सतरंगी सरस ज्योत्स्ना की रजत मदिर स्मिति से आलोकित नील सरोवर में अंगड़ाई लेती झिलमिल लहरों की आँखों में प्रतिबिंबित उषा-काल की शांत मधुर मृदु छवियों में चित्रित आभा के समान ।   जगें बातियाँ जितनी सबके रेशे-रेशे में बसे नेह की बूंद-बूंद से फूट रहे दीप्त तेज के सोते अखिल विश्व के द्वार-द्वार पर मुदित प्रकाश का अलख जगाते बहते-बहते नदियाँ बन जाएँ सींचें--- फसलों-फूलों को लता-गुल्म-वन-उपवन को अपनी-अपनी धुन में लहराती घासों को प्यास बुझाएँ--- पशु-पक्षियों की चरवाहों की थके श्रमिक की पसीने में डूबे किसान की हल-बैलों की पथिकों की दूर-निकट से चल कर आती ग्राम-युवतियों के कलश-घड़ों को भरें बतियाएँ कुछ पल उनसे सुनें-कहें सुख-दुख की बातें घर-बाहर की उनकी-अपनी सजल भाव से विदा करें आगे बढ़ जाएँ मन का सारा उत्साह उड़ेलते गंतव्य पहुँच कर मिलें परस्पर रचें जागरण-सागर जिसके स्फीत वक्ष पर निर्भय तैरें उद्दंड बाहुओं से ...

दीपावली : पाँच अनुभव

एक प्रकाश की गतियाँ गुजरती हैं मस्तिष्क से हवा खोल देती है सारे दरवाजे-खिड़कियाँ दीपों की तेजस्वी दुनिया में उछल-कूद मचाते बच्चे जोड़ते हैं किलकारियों के मेले शहर और गाँव की भेदक-रेखा को सबसे बड़ी चुनौती देते हुए निश्शेष नहीं हुई है अभी आदमी बने रहने की संभावना ।   दो प्रकाश की भंगिमाएँ रचती हैं पुकारें भाषा के पार अर्थों की सीमाएँ खंडित करते हुए घोंसले की नींद में सपनों की दुनिया रचते बच्चों को भावुक होकर निहारने के बाद टहनी पर आ बैठी चिड़िया सबसे पहले खोलना शुरु कर देती है नदी के भीतर आकार लेती अरुणाभा के अभिनव रहस्य ।   तीन प्रकाश की लहरें टकराती हैं रात-दिन अनंत के तटों से तोड़ डालती हैं प्रकाश की लहरें अनंत के अदृश्य किनारों को एक और अभिनव-अरूप अनंत रचने के लिए जहाँ कहीं ठहर जाती है यात्राओं की कल्पनाएँ वहीं बदलने लगती है सभ्यता खंडहरों में ॥    चार प्रकाश की ध्वनियाँ झाँकती हैं नक्षत्रों की आँखों में पहचानने के लिए अपनी परछाइयों की उभरती-विलीन होती आकृतियाँ मन को बांध लेता ...