गरमी बाघिन
गरमी धूप तपिश की सुबहें
सूरज चार बाँस
चढ़ते ही
घूमने लगते
लू के लठैत विकराल
किसी कोने में
छिप न सके
थोड़ी-सी भी
शीतल मंद पवन
पथिकों से
हँसी-ठिठोली करके
उनका श्रम हरने को;
सभी भयंकर ध्वनियों को
निर्ममता से
कुचल-कूट कर
तत्ते पानी में
घोल गटक जाता
मध्याह्न
अहंकार का आतंक
उगलने लगती
उसकी पथरीली आवाज़
देह के भीतरी जंगल के
कोनों से निकल
फूटने लगते
स्वेद के सोते
माथे से
पेट-पीठ से
जो भी निकले
घर के बाहर
पल भर को भी,
सिर पर
भीगे नरम तौलिये
ऊपर छाते
काले नीले
चटक छींट के
राजाओं के छत्र सरीखे
नीबू-पानी
लस्सी मट्ठा
खरबूजे तरबूज
बेल का शरबत
शहतूत
(अमरीका से
चल कर आए
कोकाकोला
पेप्सी लिम्का
आँख दिखाते
जलजीरे को)
ऐसे ही असंख्य
अस्त्रों-शस्त्रों के साथ
चुनौती देने की
हिम्मत करते
गरमी को;
थोड़ी देर
ठिठकती गरमी
अनुमान लगाती
दुश्मन की तैयारी का
(अपने बल का भी)
फिर बाघिन-सी
एक छलांग में
जा चढ़ती
पथिकों की छाती पर ।
(12. 06. 2022)
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