जितने भी दीप जलें

  

 

जितने भी दीप जलें

फलें सभी में

जन-मन के सपने

उजले सतरंगी

सरस ज्योत्स्ना की

रजत मदिर

स्मिति से आलोकित

नील सरोवर में

अंगड़ाई लेती

झिलमिल लहरों की

आँखों में प्रतिबिंबित

उषा-काल की

शांत मधुर मृदु

छवियों में चित्रित

आभा के समान ।

 

जगें बातियाँ जितनी

सबके रेशे-रेशे में

बसे नेह की

बूंद-बूंद से फूट रहे

दीप्त तेज के सोते

अखिल विश्व के

द्वार-द्वार पर

मुदित प्रकाश का

अलख जगाते

बहते-बहते

नदियाँ बन जाएँ

सींचें---

फसलों-फूलों को

लता-गुल्म-वन-उपवन को

अपनी-अपनी धुन में

लहराती घासों को

प्यास बुझाएँ---

पशु-पक्षियों की

चरवाहों की

थके श्रमिक की

पसीने में डूबे किसान की

हल-बैलों की

पथिकों की

दूर-निकट से

चल कर आती

ग्राम-युवतियों के

कलश-घड़ों को भरें

बतियाएँ कुछ पल उनसे

सुनें-कहें

सुख-दुख की बातें

घर-बाहर की

उनकी-अपनी

सजल भाव से

विदा करें

आगे बढ़ जाएँ

मन का सारा

उत्साह उड़ेलते

गंतव्य पहुँच कर

मिलें परस्पर

रचें जागरण-सागर

जिसके स्फीत वक्ष पर

निर्भय तैरें

उद्दंड बाहुओं से

जाल फेंकते

मछुआरों की नावें

जलयान-पोत

सभी देशों की

प्रगति के सूचक

संध्या के मेघों की

छाया के नीचे

तट पर बालक

अशांत जल के

अनंत वैभव से रोमांचित

देखें दिगंत की हलचल

पुतलियाँ नचाएँ

दसों दिशाओं में

विह्वल हो जाएँ

माँ की गोदी की

पकड़ शिथिल जान कर

फिसल गिरें नीचे

उठ कर

नन्हें चंचल पैरों से

दौड़ें---गिर पड़ें---उठें---फिर दौड़ें

खोजें रजतकणी

सिकता के गड्ढों में

भावी जीवन की परिभाषा ! ! !      

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                (23. 10. 2022)  

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