मेरा कस्बा मेरी धरती
मेरा कस्बा
मेरी धरती
जहाँ उगा मैं
धीरे-धीरे
इसकी मिट्टी की
भुरभुरी रेशमी
सपनीली उत्पादकता की
कुनकुनी छुवन की
गहराई से ।
मेरा कस्बा
मेरी धरती
जहाँ भोर के
झीने गुदगुदे
नरम बिछोने पर
मेरे बचपन को
हौले से
खींच अंक में
चिपटा छाती से
सुंदरता से भी सुंदर
उषा सुंदरी ने
स्तनपान कराया
टाँक दिए
वात्सल्य भरे
अनगिन चुंबन
माथे पर
पलकों पर ।
मेरा कस्बा
मेरी धरती
जिसके विस्तृत
श्यामल आंगन में
मेरी उत्साह भरी
भोली चंचल
किलकारी को
प्रात: ने अपनी
बलशाली
बाँहों में लेकर
कितनी बार उछाला
आसमान में
हँसता रहा
बजा कर ताली
ऊपर से
नीचे आते ही
लपक संभाल
कंधे पर
बैठा कर
लगा नाचने
बहलाने को ।
मेरा कस्बा
मेरी धरती
जिसकी सड़कों
गलियों
चौराहों से
जीवन के नव-रस
संबंध निभाते
ललक भरे
परिचय के
खट्टे-मीठे
अरस-रसीले
गढ़-अनगढ़
संवेदन पोषित
अक्सर खुलते
कभी नहीं भी
ऊँचे-नीचे
घर-द्वारों से
बतियाते
उलझ-सुलझ
पहचान बढ़ाते
इस जीवन के
तीन चरण बीते
कुछ भरे हुए
कुछ अधखाली
कुछ रीते ।
मेरा कस्बा
मेरी धरती
जिसके
अनंत अनुभव
हर दिन
सपने में आते
रहूँ कहीं भी
मन की सरी
चोटें सहला जाते
बदले में
अपने सीने में
दबी सिसकती
पीड़ा भी
दिखला जाते
(क्योंकि
समय ने
लेकर छेनी
और हथौड़ा
काट दिया
कस्बे का
काफी कुछ
उसके अतीत से)।
भीतर गूंज रहा है कस्बा !
भीतर गूंज रही है धरती ! !
(14. 06. 2022)
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