ज्योति बसु के लिए दो कविताएँ
एक
एक पहाड़ के भीतर
अचानक हुए भारी विस्फोट ने
रौंद डाले
दिशांतर तक फैले
जंगल-मैदान
नदियाँ- झरने
देर तक हिलते रहे
चिड़ियों के घोंसले
काँपती रहीं
चसनाला के भीतर
अब तक दिशा भटकी
अधमरी आवाजें
क्या तुम महसूस कर सके थे
इतना सब
अपने जाने के वक्त !
मेरे समय की भूख से उत्पन्न
एक बेसहारा रिरियाहट
लगातार गूर रही है
तुम्हारी पीछे छूट गई चप्पलें
जिनमें तुम
हमेशा पहचान लिए जाते थे
अपनी पूरी सच्चाई के साथ
नंगे बच्चों से घिरी
कुछ आकृतियाँ
अपने जूते छिपा रही हैं
कालीनों के नीचे
तुम्हारी चप्पलों पर
हक जमाने के लिए
भला क्यों भूल गए तुम अपनी चप्पलें
यहाँ से चलते समय !
कल से तुम्हारे सपनों का
नक्शा तय करेंगे
कुहरे से ढकी बस्तियों के
दिशाहारा भेड़िये
खड़ी करेंगे
तुम्हारी इन चप्पलों को
अपनी गवाही में ॥
(17.01.
2010)
दो
एक पेड़ का बयान
फूल से होते हुए
फल के पेट में पहुँचा
पकता रहा वहीं
मुद्दत तक
एक दोपहर
पेड़ का बयान
टपक कर
धूल में जा गिरा
आँखों में एक समझदार चमक लिए
बड़ी-बड़ी सफेद और पीली
कीलों की नोकों पर
टिके ऊँचे दरवाजे
थरथराने लगे
कबूतरों पर झपटने को
तैयार बिल्लियाँ
सोचने लगीं
हमलों के नए तरीकों के बारे में
वक्त का एक छोटा-सा टुकड़ा
मिल गया पेड़ के बयान को
कबूतरों की बंद आँखों को
आवाज देकर
उसने सिर्फ इतना कहा
‘यह डरने का समय नहीं है
सोचने का समय है’
कबूतरों की आँखों में
हरकत उभर आई है
यह बिल्लियों के लिए
अपशकुन से कम नहीं ॥
(18.
01. 2010)
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें