धागा : पाँच अनुभव

 

 

          एक

धागे और बुनकर के बीच

पसरी भाषा को ही

कहा जाता है कपड़ा

पारदर्शी गझिन मोटा पतला

किस रूप में जन्मेगा कपड़ा

निर्भर है इस बात पर

कि धागे की झोली से

बाहर उछलेंगे कौन-कौन से शब्द

क्या-क्या होगा उनके साथ

ध्वनियाँ आकृतियाँ अलंकार मुहावरे

और उन शब्दों की आग को

किस सीमा तक उतारेगा बुनकर

अपने मन की भीतरी तहों तक

कितना सह पाएगा वह

उस भाषा की आँच

जो दरअसल

कपड़ा बुनने के लिए नहीं

आदमी रचने के लिए जलती है।

 

          दो

धागे के रेशों में बहती हुई ऊर्जा ही

प्रमाणित करती है

करघे का अस्तित्व

उसी का जादू

निरंतर बदलता रहता है करघे को

अगणित रंगों के असंख्य थानो में

जिन्हें पहन लेते हैं

गाँव नगर घाटियाँ और पहाड़ जंगल

जैसे आकाश ने

पहने हों सुबह-शाम के बादल

धुपहले कत्थई सुरमई रेशमी आभा वाले

धागे के रेशों के गाँव में

जुड़ता है रंगों का मेला

दौड़े चले आते हैं सभी मेले में

पारियों की दुनिया में जैसे दौड़ते हैं बच्चे

सपनों में।

 

          तीन

धागे का सबसे निजी रिश्ता है

मिट्टी से

उसकी गंध से ही नहीं

जीवनी-शक्ति और संकल्प से भी

धागे की शिराओं में

बहती है मिट्टी

जिसने कभी सिरजा था उसे

उसकी साँसों में मौजूद मिट्टी ही

उसे सिखाती है

आदमी का साथ निभाते हुए

रेशा-रेशा बिखर जाने की कला।

 

          चार

धागा ही जोतता रहा

हमारी सदी का हल

समय की कर्री-काली मिट्टी

भुरभुरी करते हुए

धागा ही रचता रहा खेत

कपास के फूलों से

धागा ही ढाँपता रहा

सभ्यता की अश्लीलता।

 

          पाँच

धागा

रचना चाहता है एक दुनिया

भविष्य की

जिसमें सबके लिए जगह हो

लेकिन उनके लिए नहीं

जो भोजन की मेज पर

परोसते हों 

युद्ध की भाषा के व्यंजन

उनके लिए भी नहीं

जो अंतरिक्ष को बनाना चाहते हों

जूता पोंछने का कपड़ा

धागा

उन्हें भी नहीं बना चाहता नागरिक

अपनी दुनिया का

जो शांति के लिए

ज़रूरी मानते हों विचारों की हत्या

चिड़ियों से छीनते हों घोंसले

जंगलों से हँसी

नदियों से

पानी के साथ जुड़ा मादक प्रेम

बच्चों से किलकारियाँ और-

घरौंदे बनाने की आजादी,

हम चाहे विश्वास न करें

मगर धागा आश्वस्त है

कि कभी-न-कभी

वह रच ही लेगा

अपनी एक अलग दुनिया।

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