घर
घर से लौटा हूँ
लेकिन लौटा कहाँ हूँ !
घर तो मैं कभी गया ही नहीं
खोजता जरूर रहा घर
अपने भीतर अपने बाहर
मगर वह कभी मिला नहीं मुझे
अकेले क्षणों में पिघलते चौराहों पर
आवाजों के ऊँचे पहाड़ों पर चढ़ कर
पुकारा मैंने घर को
कि आओ यार !
एक बार तो आ जाओ मेरे पास
मगर वह सुनता तब ना !
ऐसा पत्थरदिल क्यों हो जाता है घर ?
दूर क्यों चला जाता है घर ?
किसी-किसी से !!
(08.
05. 2010)
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